
पूर्णिया:

कसबा विधानसभा का राजनीतिक पारा इन दिनों पूरे परवान पर है। यहां चुनावी मुकाबला जितना दिलचस्प है, उतना ही अनिश्चितता का चादर ओढ़े हुए है।आलम यह है कि हर दिन नये समीकरण गढ़े जा रहे हैं और शाम होते होते यह समीकरण ताश के पत्तों की तरह भड़भड़ा कर बिखरते नजर आ रहे हैं। कसबा शहर से लेकर गांवों के हर एक व्यक्ति नुक्कड़ों पर चुनावी पंडित की भूमिका में है। चर्चा यह कि -” किसके सिर पर होगा कसबा का ताज”।
एनडीए ने उतारा है नया चेहरा
एनडीए ने इस बार कसबा से व्यवसायी नितेश सिंह पर भरोसा जताया है। वे लगातार जनसंपर्क में जुटी हैं और विकास के मुद्दे को केंद्र में रख रहे हैं। उनका प्रचार अभियान गांव-गांव तक पहुंच चुका है, जहां महिलाओं और युवाओं में उनकी पकड़ मजबूत बताई जा रही है।
महागठबंधन भी नये चेहरे पर खेला दाव
महागठबंधन ने इस बार कसबा सीट पर बड़ा दांव खेलते हुए कसबा के पूर्व प्रमुख मो इरफान आलम को टिकट दिया है। इरफान आलम जनता के बीच लगातार प्रचार में हैं और कहते हैं, कसबा में अब बदलाव की जरूरत है।
ये भी है मैदान में
आम आदमी पार्टी से भानु भारतीय, एआईएमआईएम से शाहनवाज आलम ,जनसुराज से इत्तेफाक आलम उर्फ मुन्ना आदि मैदान ताल ठोक रहे और सभी अपने अपने स्तर से चुनाव प्रचार कर रहे है। सबों का अपने अपने जीत का दावा भी कर रहे है।इन मुख्य दावेदारों के बीच कई कद्दावर निर्दलीय प्रत्याशी भी पूरे दमखम के साथ मैदान में हैं। इनमें कुछ स्थानीय प्रभावशाली चेहरे हैं, जिनका वोट बैंक पर असर देखा जा रहा है। दिलचस्प यह है कि कई निर्दलीय प्रत्याशी खुलकर कहते नजर आते हैं। न हम जीतेंगे, न फलां को जीतने देंगे। यानी इस बार चुनावी तस्वीर में निर्दलीयों का रोल निर्णायक साबित हो सकता है। कसबा में इस समय राजनीति हर बातचीत का विषय है। चाय की दुकानों पर बहसें चल रही हैं कोई कह रहा है -“इस बार नया चेहरा” दूसरा कह रहा-” ओल्ड इज़ गोल्ड “।

कसबा में सियासी तापमान बढ़ा
जनसुराज के समर्थक परिवर्तन की बात करते हैं, जबकि एनडीए समर्थक अपने पुराने कामकाज के दम पर वोट मांग रहे हैं। धनतेरस, दीपावली और छठ जैसे पर्वों के बीच इस बार कसबा की सियासत भी अपने चरम पर है। त्योहारी भीड़ और चुनावी जोश ने पूरे इलाके का टेम्परेचर बढ़ा दिया है।
जनता ही निर्णायक
दुकानों की चहल-पहल के साथ पोस्टर-बैनर और जनसभाओं की गूंज पूरे अनुमंडल क्षेत्र में सुनाई दे रही है। अब सबकी निगाहें मतदान दिवस पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि कसबा की जनता ने किस पर भरोसा जताया। एक बात तय है, इस बार कसबा की जंग सिर्फ सीट की नहीं, सियासी वर्चस्व की है, और अंतिम फैसला जनता के हाथ में है।
Author: pankaj jha








