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सोमनाथ ज्योतिर्लिंग: राजा दक्ष के श्राप से मुक्ति के लिए चन्द्रमा ने की थी इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना, पापों से मुक्ति के लिए होती है सोमनाथ की आराधना

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Somnath Jyotirlinga: हिंदू धर्म में शिव का आराधना का विशेष महत्व है.देश में शिव के 12 ज्योतिर्लिंग हैं, और शिव महापुराण में इन सभी ज्योतिर्लिंगों की जानकारी दी गई है. इन ज्योतिर्लिंगों में गुजरात के सोमनाथ मंदिर को पहला माना जाता है. भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर, गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे, वेरावल बंदरगाह से थोड़ी दूर पर है.इस सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कन्दपुराण आदि में भी विस्तार से बताई गई है.
क्यों कहा जाता है सोमनाथ?
शिवपुराण के अनुसार एक बार चंद्र देवता से उनके श्वसुर राजा दक्ष किसी बात को लेकर नाराज हो गए और उन्हें श्राप दे दिया कि उनका प्रकाश दिन-प्रतिदिन क्षीण होता चला जाएगा. उन्होंने इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए सरस्वती नदी के मुहाने पर महादेव के इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की और कठोर तपस्या की. प्रसन्न होकर जब शिव ने उन्हें श्राप से मुक्ति दिलाई तो चंद्रमा ने भगवान शिव से यहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान रहने की प्रार्थना की थी. चंद्रमा का एक नाम सोम भी है, उन्होंने भगवान्‌ शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी. इसलिए इस ज्योतिर्लिंग को सोमनाथ कहा जाता है. इसके दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं.साथ ही उनके लिए मोक्ष का मार्ग उनके लिए सहज ही सुलभ हो जाता है.
मंदिर की खासियत
सोमनाथ विश्वप्रसिद्ध मंदिरों में एक है। सोमनाथ मंदिर की ऊंचाई लगभग 155 फीट है. मंदिर के ऊपर एक कलश है, जिसका वजन करीब 10 टन है. यहां लहरा रहे ध्वजा की ऊंचाई 27 फीट है. मंदिर को तीन भागों में विभाजित किया गया है और प्रवेश करते ही विशाल आंगन दिखता है. मंदिर के केंद्रीय हॉल को अष्टकोणीय शिव-यंत्र का आकार दिया गया है. आपको बता दें कि सोमनाथ मंदिर पर कुल 17 बार आक्रमण हुए और हर बार मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया.
मंदिर के दक्षिण में बाण स्तंभ
समुद्र के किनारे मंदिर के दक्षिण में एक बाण स्तंभ है. इतिहास में 6वीं शताब्दी के आसपास बाण स्तंभ का उल्लेख मिलता है. जानकार बताते हैं कि बाण स्तंभ एक दिशादर्शक स्तंभ है, जिसके ऊपरी सिरे पर एक तीर (बाण) बनाया गया है. इस बाण स्तंभ पर लिखा है ‘आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव, पर्यंत अबाधित ज्योतिमार्ग’. इसका मतलब ये है कि समुद्र के इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं है. यानी इस स्तंभ से दक्षिण ध्रुव तक एक सीधी रेखा खींची जाए तो बीच में एक भी पहाड़ या भूखंड का टुकड़ा नहीं आता है.
पूजा से मिट जाते हैं सारे पाप
इस ज्योतिर्लिंग को सोमनाथ कहा जाता है इसके दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के सारे पाप और दुष्कृत्यु विनष्ट हो जाते हैं.वे भगवान्‌ शिव और माता पार्वती की अक्षय कृपा का पात्र बन जाते हैं.मोक्ष का मार्ग उनके लिए सहज ही सुलभ हो जाता है. उनके लौकिक-पारलौकिक सारे कृत्य स्वयमेव सफल हो जाते हैं.

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Author: sanvaadsarthi

संपादक

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